1पुराने देहाती स्टेशन में तिपतिया घास और कोयले के धुएँ की सौंधी खुशबू थी। आख़िरी सुनहरे उजाले में थॉमस प्लेटफ़ॉर्म पर फुफकारते हुए पहुँचा और पर्सी चुपचाप उसके पीछे आकर रुका।
2“देखो, पर्सी!” थॉमस ने कहा, उसकी बड़ी गोल आँखें चमक उठीं। “प्लेटफार्म की लालटेनें जल रही हैं!”
3थॉमस से रुका नहीं गया। “अब अगली वाली दूर की लालटेन होगी — नहीं, पास वाली — नहीं, मुझे पूरा विश्वास है अब दूर वाली ही जलेगी!” वह अपने पहियों पर उत्साहित होकर हिलने लगा।
4पर्सी कुछ नहीं बोला। वह बस देखता रहा। उसकी बड़ी आँखें धीरे-धीरे घूमीं — पास वाली, दूर वाली, पास वाली, दूर वाली — जैसे किसी मद्धम लय के साथ, उसी पैटर्न का अनुसरण करतीं।
5थॉमस चुप हो गया। एक लालटेन पास जली, फिर दूर। पास। दूर। पास। दूर। वही पैटर्न वहाँ था, शांत और स्थिर, जैसे साँस लेना।
6“ओह,” थॉमस ने बहुत हल्की आवाज़ में कहा। उसकी आँखों में कोमलता आ गई।
7थॉमस ने दिमाग़ में पैटर्न दोहराया: पास, दूर, पास, दूर — और आखिरी जली लालटेन पास वाली थी।
8“दूर,” थॉमस ने कहा। उसने ज़ोर से नहीं बोला। उसने खुद से धीरे से कहा, जैसे सवाल धीरे-धीरे जवाब बन जाता है।
9आख़िरी दूर वाली लालटेन सोने सी गरमाहट के साथ जगमगा उठी। पर्सी बड़े मुस्कान के साथ खिलखिला उठा।
10थॉमस भी मुस्कुराया। दोनों इंजन रेल की पटरियों पर साथ-साथ बैठे रहे, तिपतिया घास से महकती हुई शाम पर उस रोशनी को चुपचाप निहारते हुए, और जाने की कोई जल्दी नहीं थी।
