1जुनिपर चौड़ी खिड़की की श sill पर बैठी थी और देख रही थी कि आसमान नारंगी रंग में रंगता जा रहा है। रौशनी धीरे-धीरे, बहुत धीरे-धीरे छतों से फिसलती जा रही थी, जैसे गर्म शहद ढलक रहा हो।
2एक गौरेया फड़फड़ाती हुई गुज़री। जुनिपर ने लंबी, धीमी पलक झपकी। गौरेया अपने घोंसले की ओर उड़ गई। शुभरात्रि, गौरेया।
3एक चिमनी ने अपना आखिरी छोटा सा धुएँ का बादल उड़ाया। जुनिपर ने नाक उठाई और मुलायम, धुंआसी हवा को सूंघा। धुआँ धीरे-धीरे छितर गया। शुभरात्रि, चिमनी।
4गली के पार वाला बड़ा ओक का पेड़ अब सरसराना बंद कर चुका था। उसकी पत्तियां शांत और गहरी हो गई थीं। जुनिपर ने अपनी पूंछ को हल्का सा हिलाया। शुभरात्रि, पेड़।
5फिर — वहाँ। नीले पर एक छोटा सा चमकीला बिंदु टिमटिमाया। पहला तारा। जुनिपर ने अपनी नाक ठंडी काँच से लगाई और उस पर एक छोटा सा धुँधला घेरा बना दिया। शुभरात्रि, तारा।
6चाँद छतों के ऊपर फैला और हल्का-सा उजाला फैल गया। खिड़की पर चांदी की उजास बिखर गई। जुनिपर ने पहले आधी, फिर पूरी, फिर दोबारा आधी आँखें बंद कीं। शुभरात्रि, चाँद।
7अंतिम खिड़की की रौशनी धुंधली हुई, होती गई — और फिर गायब हो गई।
8जुनिपर ने चुपचाप खिड़की से उतरकर अपनी चार नरम पैरों से फर्श पर तड़ तड़ तड़ तड़ किया।
9वह एक बार मुड़ी। फिर दोबारा मुड़ी।
10वह गोल-गोल सिमट गई— जैसी सभी बिल्लियाँ तब सिमटती हैं जब सारी दुनिया सो चुकी होती है — और अपनी नाक अपनी पूंछ के नीचे छुपा ली।



