1मिलो एक छोटा रैकून था, जिसकी पूंछ पर धारियां थीं, चेहरा नकाब जैसा और जब उसे भूख लगती थी तो उसका पेट भी गड़गड़ाता था। लेकिन कभी-कभी उसके अंदर कुछ और भी गड़गड़ाता था — ऐसा कुछ जिसका नाम ही न था। कुछ ऐसा, जैसे उसके अंदर मौसम बदल रहा हो। एक सुबह मिलो अपने घर से कूदकर सुनहरी धूप वाले जंगल में गया। आज नदी के किनारे पिकनिक का दिन था! उसकी नन्हीं टांगें काई से ढकी ज़मीन पर थिरक रही थीं। उसका सीना फिज़ी और गर्म महसूस हो रहा था, जैसे उसके पसलियों के पीछे ही सूरज छुपा है।
2"धूप खिली है!" उसने किसी से नहीं, खुद से ही कहा, क्योंकि उसके भीतर भी बिल्कुल ऐसा ही महसूस हो रहा था — खुला, उजला और उमंग से भरा।
3फिर मिलो ने देखा कि नदी तक जाने वाला रास्ता कुछ अलग सा लग रहा है। रास्ते में एक पुराना ओक का पेड़ गिर गया था और अब उसे समझ नहीं आया कि जाएं तो किस तरफ? उसका पेट सिमट गया। एक हल्की और धीमी सी ग्रेहट, बादलों जैसी, उसके भीतर सरकने लगी।
4"बादलों जैसा," मिलो ने धीरे से कहा। वह अपनी दादी, नाना ब्रेका के पास चला गया, जो पिकनिक टोकरी ला रही थीं। "मेरे अंदर बादल हैं," उसने उन्हें बताया, "मुझे रास्ता नहीं पता।" नाना ब्रेका ने टोकरी रखी और अपनी धूसर नाक धीरे से उसके माथे से छुआई। "बादल ठीक हैं," उन्होंने कहा। "ये हमेशा नहीं रहते।"
5उन्होंने मिलकर नया रास्ता ढूंढा।
6पर जब मिलो का चचेरा भाई पिप आया और मिलो की बड़े ध्यान से सजाई नदी की पत्थरों की ढेरी को गिरा दिया — धड़ाम, छपाक, सब बिखर गया — तो उसके अंदर के बादल गहरे और तेज़ हो गए, जैसे बिजली बज उठी।
7"आंधी!" मिलो ने गुर्राते हुए कहा, उसकी पूंछ तन गई। उसे सच में गरज जैसा लग रहा था। उसने काटा नहीं। उसने नोचा नहीं। लेकिन उसने चारों पैर मिट्टी पर ज़ोर से पटके, और उसके भीतर वह गुस्से की गरज घूमने लगी — बड़ी, भयंकर, हद से ज्यादा।
8नाना ब्रेका पास आ गईं। "इस तूफ़ान को सांस चाहिए," उन्होंने कहा। मिलो ने अपनी नाक से धीरे-धीरे ऐसे सांस भरी, जैसे नदी बहती है, और मुंह से बाहर छोड़ी। एक बार। दो बार। तीन बार। गड़गड़हट थोड़ी दूर सरक गई।
9कुछ देर बाद, जब पिप ने पत्थर ढूंढे और उन्हें फिर से जमा दिया, तो मिलो के भीतर कुछ और ही आया। कुछ ऐसा, जैसे हल्की बारिश हो रही हो — चुपचाप और लगातार।
10मिलो कंबल के किनारे गोल हो गया, उसकी ठोड़ी उसके पंजों पर आ गई थी। "बरसात जैसा," उसने बुदबुदाकर कहा। वह खुद भी नहीं समझ पाया क्यों। कभी-कभी बरसात-सा मन यूं ही आ जाता है।
11नाना ब्रेका उसके पास चुपचाप आकर बैठ गईं। बस वैसे ही, गर्माहट के साथ, चुपचाप। फिर बोलीं, "बारिश से चीज़ें उगती हैं, जानते हो।" मिलो ने कुछ नहीं कहा, उसने बस अपना छोटा मुखौटा-सा चेहरा उनकी नरम बगल में टिका दिया और इंतजार किया। जैसे भारी बादल छंटने का इंतजार करते हैं — ये विश्वास करते हुए, कि आसमान फिर साफ़ हो ही जाएगा। और धीरे-धीरे — जैसे मौसम आख़िरकार बदल ही जाता है — सब ठीक हो गया।
12नदी चमक उठी। पिप ने उथले पानी से आवाज़ लगाई। और फिर मिलो के सीने के पीछे धीरे-धीरे कुछ धूप-सा, गर्म और छोटा, चमक उठा। वह चारों टांगों पर उछलता नदी की ओर भागा, उसकी धारीदार पूंछ एक झंडे की तरह लहरा रही थी। अब उसके अंदर का मौसम बदल गया था।



